नई श्रम संहिताओं की प्रतियां भी जलाई, केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते नये श्रम कानून को निरस्त की मांग
रुद्रपुर। मोदी सरकार द्वारा देशी विदेशी बड़े पूँजीपतियों के इशारे पर पूरे देश में मजदूर विरोधी चार श्रम संहिताओं को लागू करने के विरोध में श्रमिक संयुक्त मोर्चा के बैनर तले श्रम भवन पर प्रदर्शन कर धरना दिया। साथ ही नई श्रम संहिताओं की प्रतियां भी जलाई। केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। यहां आयोजित सभा में वक्ताओं ने कहा कि चार श्रम संहिताओं को लागू करके मोदी सरकार ने मजदूरों के स्थाई नौकरी पाने, संगठित होने और हड़ताल करने के अधिकारों पर भारी चोट की है। स्थाई काम पर ठेका, कैजुअल, ट्रेनिंग और फिक्स टर्म के रूप में अस्थाई और अधिकार विहीन मजदूरों को नियोजित करने हेतु मालिकों को असीमित कानूनी छूट व अधिकार दे दिए हैं। आठ घंटे कार्यदिवस के अधिकार को एक तरह से छीन लिया है। पेंशन, पीएफ, ग्रेच्युटी, ईएसआई, ग्रेच्युटी के अधिकार पर भी हमले किये गये हैं। महिला मजदूरों को रात की पाली में और खतरनाक उद्योगों में कार्य कराने की छूट देकर महिला श्रमिकों और उनके बच्चों की स्वास्थ्य, जीवन और सुरक्षा को खतरे में डाला गया है। श्रम विभाग और श्रम न्यायालयों को कमजोर और पंगु बनाने की साजिश रची गईं है। वक्ताओं ने कहा कि एक तरफ मोदी सरकार बड़े – बड़े पूँजीपतियों के लाखों करोड़ रूपये के लोन और टैक्स माफ किये गये हैं, तो वहीं नई श्रम संहिताओं को लागू करके मजदूरों को गुलामी की जंजीरों में जकड़ने की कवायद की जा रही है।नई श्रम संहिताओं के रूप में पूँजीपति वर्ग भारत देश के मजदूर वर्ग पर राजनीतिक हमला बोला गया है। श्रमिक नेताओं ने कहा कि चार श्रम संहिताओं को सरकार बहुत अच्छा बता रही है वे दरअसल मजदूरों की गुलामी के दस्तावेज हैं। पुराने 44 श्रम कानूनों में जो अधिकार मजदूरों को हासिल थे, उन अधिकारों में कटौती करके सरकार ने नए सिरे से 4 श्रम संहिता बना दी हैं। पहले श्रमिक अपनी योग्यता के दम पर 58 वर्ष की उम्र तक स्थाई नौकरी फैक्ट्रियों में पा लेते थे। लेकिन इन 4 श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद स्थाई नौकरी के बजाय निश्चित अवधि यानि फिक्स्ड टर्म जॉब होगी। निश्चित अवधि की नौकरी के बावजूद श्रमिक के ऊपर हमेशा हायर एंड फायर पॉलिसी के तहत फायर होने(नौकरी से निकाले जाने ) का खतरा बना रहेगा। नए श्रम संहिताओं में अब कोई भी 300 श्रमिक नियुक्त करने वाला कंपनी मालिक मनमर्जी से जब चाहे तब , बिना राज्य सरकार से अनुमति प्राप्त किए कंपनी बंद कर सकता है। पहले श्रम कानूनों में यह सीमा 100 श्रमिक की थी। हड़ताल करने वाले मजदूरों को अपराधिक कानून के तहत जेल जाना पड़ सकता है। जाहिर है कि श्रम संहिताओं को मजदूरों को गुलाम बनाने के लिए लाया गया है। कार्यक्रम को इंकलाबी मजदूर केंद्र के कैलाश भट्ट, सुरेंद्र, सीएसटीयू धीरज,भाकपा (माले) के ललित मटियाली,अनिता, फिरोज, सुब्रत विश्वास,सुनीता,हीरा सिंह राठौर,उत्तम दास, जगमोहन डसीला,सुमित, विवेक पांडे, पुरुषोत्तम मौर्या ने भी संबोधित किया। अध्यक्ष श्रमिक संयुक्त मोर्चा दिनेश तिवारी समेत अन्य कई श्रमिक नेता मौजूद रहे।

